वीडियो में साझा किए गए आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 9.6 प्रतिशत लोग मधुमेह से ग्रसित हैं। इनमें से करीब 12 प्रतिशत आगे चलकर डायबिटिक रेटिनोपैथी विकसित करते हैं, और जिन्हें रेटिनोपैथी होती है उनमें से लगभग 4 प्रतिशत ऐसी अवस्था तक पहुँचते हैं जो निगाह के लिए ख़तरा बन जाती है।
मधुमेह तीन तरह का होता है — टाइप 1, टाइप 2, और गर्भावस्था में होने वाला जेस्टेशनल डायबिटीज।
शुगर आँख में तीन तरह से असर करती है
- डायबिटिक रेटिनोपैथी — सबसे आम।
- सफ़ेद मोतिया।
- काला मोतिया।
सफ़ेद और काला मोतिया — दोनों का जोखिम मधुमेह में लगभग दुगना हो जाता है।
डायबिटिक रेटिनोपैथी होती कैसे है
जब ब्लड शुगर का स्तर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा रहता है, तो पूरे शरीर की रक्त वाहिकाओं को नुकसान होता है। जब यह नुकसान आँख के अंदर की वाहिकाओं में होता है और वे बंद हो जाती हैं, तो शरीर नई वाहिकाएँ बनाता है।
लेकिन ये नई वाहिकाएँ ठीक से काम नहीं करतीं। ये लीक करती हैं — इनसे तरल और प्रोटीन रिसता है, जिससे आगे चलकर सूजन बनती है। और ये बहुत नाज़ुक होती हैं, इसलिए बार-बार बहुत आसानी से रक्तस्राव भी करती हैं।
जोखिम कम करने के लिए क्या करें
सबसे पहले, अपने ब्लड शुगर को स्थिर और नियंत्रण में रखें। HbA1c — जो पिछले तीन महीने का औसत ब्लड ग्लूकोज़ बताती है — अगर छह से सात के बीच रहे, तो मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं का ख़तरा काफ़ी कम हो जाता है।
अगर शुगर का असर आपकी आँख में आ चुका है, तो नेत्र विशेषज्ञ से डाइलेटेड आई एग्ज़ाम — यानी पुतली फैलाकर पूरे पर्दे की जाँच — हर चार से छह महीने पर कराएँ, या जैसा आपके डॉक्टर ने बताया हो।
अगर आप मधुमेह के मरीज़ हैं, तो साल में एक बार आँख की जाँच ज़रूरी है — तब भी, जब कुछ भी तकलीफ़ न हो।
यह लेख सामान्य जानकारी है। अपनी आँखों के लिए डॉक्टर से मिलें।