आपने सही सुना — जैसे शरीर का ब्लड प्रेशर होता है, वैसे ही आँख का भी एक प्रेशर होता है। काले मोतिया में यही प्रेशर बढ़कर आँख की नस को नुकसान पहुँचाता है।
काला मोतिया क्या है
आँख की नस एक तार की तरह है जो आँख को दिमाग से जोड़ती है। हम जो चित्र देखते हैं, दिमाग उसे इसी तार के ज़रिए पहचानता है। काले मोतिया में यह नस धीरे-धीरे सूखने लगती है — तो आँख चित्र देखती है, लेकिन दिमाग उसे पहचान नहीं पाता।
आँख का प्रेशर (आईओपी) 10 से 21 मिलीमीटर मरकरी के बीच होना चाहिए। अगर यह 21 से ऊपर चला जाए तो नस को नुकसान शुरू हो सकता है।
काले मोतिया का शुरुआती दौर में कोई ऐसा लक्षण नहीं होता जिससे आप खुद पहचान सकें। इसीलिए यह चुपचाप निगाह ले जाता है — और इसीलिए जाँच ही एकमात्र तरीका है।
काला मोतिया कितने प्रकार का होता है
काला मोतिया कई प्रकार का है, पर मुख्य तौर पर तीन तरह से समझा जा सकता है।
- एंगल क्लोज़र ग्लूकोमा — आँख के अंदर तरल पदार्थ बन रहा है, लेकिन बाहर निकल नहीं पा रहा।
- ओपन एंगल ग्लूकोमा — निकासी का रास्ता ठीक है, पर तरल ज़्यादा बन रहा है।
- तीसरे प्रकार में नस खुद ही संवेदनशील होती है और सामान्य प्रेशर पर भी नुकसान झेलती है।
किसे ज़्यादा खतरा है
- जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक है।
- जिन्हें ब्लड प्रेशर, मधुमेह, दिल की समस्या या माइग्रेन है — इन बीमारियों में ऑप्टिक नस अधिक संवेदनशील होती है और नुकसान का खतरा बढ़ता है।
- जिनके परिवार में माता-पिता या किसी नज़दीकी रिश्तेदार को काले मोतिया से निगाह का नुकसान हुआ है।
- जिन्हें बचपन में आँख पर चोट लगी है, या पहले आँख का कोई ऑपरेशन हुआ है।
- जिनकी दूर या नज़दीक की निगाह बहुत कमज़ोर है, या जिन्होंने किसी बीमारी के चलते लंबे समय तक स्टेरॉइड्स लिए हैं।
कुछ मामलों में काला मोतिया जन्म से भी होता है।
तीन बुनियादी जाँचें
- 1आँख का प्रेशर (टोनोमेट्री)। दो तरीके हैं — नॉन-कॉन्टैक्ट, जिसमें आँख को छुए बिना हवा के एक झोंके से प्रेशर नापा जाता है; और कॉन्टैक्ट, जिसमें आँख पर एक लेंस रखकर नापा जाता है।
- 2गोनियोस्कोपी। एक विशेष लेंस से आँख के एंगल को देखा जाता है — काली पुतली और सफ़ेद हिस्से के जोड़ पर बना वह कोना, जहाँ से तरल निकलता है।
- 3पेरीमेट्री। यह नस की सेहत बताती है — कितनी कमज़ोर है, किस हिस्से में, और कितनी मात्रा में। हर फ़ॉलो-अप पर हम इसी को देखते हैं।
इन तीन जाँचों के आधार पर डॉक्टर तय करता है कि इलाज शुरू करना है या नहीं, और अगर करना है तो कैसे।
इलाज
काले मोतिया की रोकथाम संभव है। हमारे पास आई ड्रॉप्स, लेज़र और सर्जरी — तीनों विकल्प उपलब्ध हैं। आमतौर पर शुरुआत आई ड्रॉप्स से होती है।
कौन सा मॉलिक्यूल आपके लिए ठीक है, यह कई बातों पर निर्भर करता है — आपकी आँख की बनावट, आपका बॉडी टाइप, और कोई दूसरी बीमारी या दवा जो चल रही है।
काले मोतिया की दवाओं के कुछ साइड इफ़ेक्ट भी होते हैं। इसलिए दवा शुरू होने के बाद नियमित फ़ॉलो-अप ज़रूरी है — यह देखने के लिए कि प्रेशर सही तरह घट रहा है और कोई बड़ी दिक्कत नहीं हो रही।
दवा डालने का एक ख़ास तरीका: पंक्टल ऑक्लूज़न
काले मोतिया की ड्रॉप्स डालने का एक विशेष तरीका है, जिसे पंक्टल ऑक्लूज़न कहते हैं।
- 1नीचे की पलक खींचकर एक पॉकेट बनाएँ और उसमें दवा की एक बूँद डालें।
- 2अब नाक की तरफ़ वाले कोने पर हल्के से उँगली रखकर लगभग एक मिनट दबाएँ।
इससे दवा आँख में ज़्यादा देर रहती है और नाक के रास्ते गले में नहीं उतरती। दवा गले में जाने पर कई लोगों को खराश, कड़वापन और भूख कम लगने जैसी शिकायत होती है — यह तरीका उससे बचाता है।
काले मोतिया में जो निगाह चली गई है, वह वापस नहीं आती। इलाज उसे बचाता है जो अभी बची है — इसीलिए समय पर पकड़ना सबसे ज़रूरी है।
अगर आप ऊपर बताए जोखिम वाले समूह में आते हैं, तो नियमित रूप से अपने नेत्र विशेषज्ञ से आँख की जाँच कराएँ — लक्षण का इंतज़ार न करें।
यह लेख सामान्य जानकारी है। अपनी आँखों के लिए डॉक्टर से मिलें।
